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CHILDHOOD MEMORIES / बचपन की यादे

Weekly contest winner’s write-up:

Childhood memories

Can we even point a single soul on this earth who doesn’t want that splendid childhood days back? Childhood is one’s golden period in the entire journey of life. Now, we giggle at those moments when we cried for the seeds of the consumed fruits and vegetables, that we planted but failed to shoot up. Even the unpalatable dishes tasted delicious when fed by mother. The hilarious part was the foolish acts of trying to be a superhuman in order to save the world when we couldn’t even save ourselves from petty troubles. We would feel like having gotten the world in our hands when the teacher draws a ‘Star’ symbol or writes ‘Good’ in our classwork. The endless inquisitive chatting we had with our grandparents was the sweetest part. We can only relive those memorable days in our hearts and we are helplessly nostalgic.

-V. DHEEBIGA
INSTA: dheebiga25

शीर्षक -बचपन की यादें।

उस बचपन की यादों में आज फिर खो जाने को जी चाहता है।
उन पलों को आज फिर खुलकर जीने को जी चाहता है।
वो देखो पेड़ की डाली आज भी कैसी झुकी है,
उस बुढ़ी डाली को फिर झुलने को जी चाहता है।
उस आसमां को देखो चंदा मामा कैसे हंस रहा है,
उसकी छवि देख जरा चैन से सोने को जी चाहता है।
इतरा कर चलु और द़ौड़ पड़ूं उन गलियों में,
आज फिर से बेफिक्र चलने को जी चाहता है।
सूनी आंगन देख जरा जी भरकर देख तो लूं,
इस वीराने में मुझे अकेले एकपल रो लेने को जी चाहता है।
वो देखो मेरे खिलौने बिखड़ी पड़ी मेरी गुड़िया रानी,
आज फिर से उसके बाल संवार लेने को जी चाहता है ।
वो सुखे पेड़ सुखे तालाब कैसे रेगिस्तान बने पड़े हैं,
जरा सी जान इनपे भी डाल देने को जी चाहता है ।
वो बुढ़ी के बाल वाले काका न जाने कहां खो गए,
एक याद उन पलों में खो जाने को जी चाहता है।
वो खेल बचपन के जो खेले थे हमने,
आज फिर से खेलने को जी चाहता है।
उस बचपन की यादों में आज फिर खो जाने को जी चाहता है।
उन पलों को आज फिर खुलकर जीने को जी चाहता है।

बुल्टी दास सरकार।
Insta I’d -bulty.sarkar.

शीर्षक: बचपन की यादे

ये बचपन , मेरा बचपन ,
तेरा बचपन , सबका बचपन ,
है लाख दुआओ का गहना
ऐ बचपन तेरा क्या कहना ॥

याद है धुँधली रात रसीली
जब समय की चाबी भरते थे
प्रात: काल की चिड़िया को
जब दाना चुग्गा करते थे
हाथो की थाली से वो
बेसब्रे मक्खन का बहना
ऐ बचपन तेरा क्या कहना ॥

क्या याद है वो या भूल गए
मन की अलमस्त तरंगो को
पेड़ो की शाखा घर अपना , बिखरे पत्ते
मिट्टी की डली और लिपटे कीट पतंगो को
दिन तो दिन क्या जूगनू ढूँढे सारी रैना
ऐ बचपन तेरा क्या कहना ॥

लगता है यही ये बात है जैसे आज की ही
मिट्टी के घरौंदे मे सब था
जो नहीं मिला वो बना लिया कागज के कुछ टुकड़ो से
दिखते ही कही छुप जाते थे हम
नए नए उन मुखड़ो से
धूल सिरहाने पर रखना नंगे तन बारिश मे बहना
ऐ बचपन तेरा क्या कहना ॥

नित नित के सब भेष नए थे
सपनों मे भी देश नए थे
शिखर दोपहरी तपती फिर भी
ठंडे शीतल खेल नए थे
उन दिनो ना कोई कृत्रिम था
अब तो मुमकिन लगता है
दिन रात नकाबो मे रहना
ऐ बचपन तेरा क्या कहना ॥

सोचा मैंने है बहुत फर्क
एक दूजे के बचपन मे
माँ सबकी है ओर बोझ भी है
रस्ता भी वही और दौर वही
एक की माँ उसके
बोझ को लेकर चलती है
एक की माँ उसी के सिर
बोझ पे बोझ बदलती है
एक अपनी ही अपनी हाँक रहा

एक भूखी ख़्वाहिश की खातिर
मैली कतरन से झाँक रहा
पूछ उठा भूखा बचपन भूखी माँ से
माँ बोली बेटा
अपना तो करम है सब सहना
सहकर बस आगे रहना ,
होगा तुझको आगे रहना
ऐ बचपन तेरा क्या कहना ॥

भगत सिंह
Insta ID- bhagattop10

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